”पत्रकार साहब का ए/सी और जनता का बुलडोजर दिखा नहीं..?”

शहर के मशहूर पत्रकार जी अपने ठंडे ए/सी दफ्तर में बैठकर, मखमली कुर्सी पर झूलते हुए एक लेख लिख रहे थे। जो मामला पहले ही सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका था, खबर हर जगह उजागर हो गई थी, जनता बुलडोजर ले कर रास्ते भी खोदवा दिए थे, तब जाकर “पत्रकार साहब” की कलम जागी। उन्होंने शब्दों के ऐसे तीर चलाए की वेब पोर्टल की पेज लथपथ हो गया। तभी दफ्तर के कांच वाले दरवाजे को धकेलते हुए एक धूल से सना हुआ शख्स अंदर आया। उसके चेहरे पर धूप की कालिख थी और आँखों में एक अजीब सी चमक। उसने मोबाईल पर वीडियो दिखाया और बोला “साहब कुछ करो ” फिर पत्रकार साहब कमरे मे बैठे बैठे शब्द का अम्बार लगा दिए। कमाल का लिखते हैं।
खबर पुरानी होने के बाद हिम्मत दिखाने के लिए आपकी इस जादुई कलम को मेरा इक्कीस तोपों वाला सलाम!”

पत्रकार जी मुस्कुराए, उन्हें लगा तारीफ हो रही है। बोले, “शुक्रिया! सच लिखना हमारा फर्ज है।” शख्स हंस पड़ा, “साहब, ये सच नहीं है, ये तो सच का ‘पोस्टमार्टम’ है। सच तो बाहर उस उबड़-खाबड़ रास्ते पर पड़ा है जिसे देखने के लिए ए/सी से बाहर निकलना पड़ता है। काश! आपने कभी ग्राउंड ज़ीरो पर कदम रखा होता, तो आपको पता चलता कि जिस रास्ते पर आज जनता का गुस्सा ‘बुलडोजर’ बनकर चला है, उसका मंजर क्या था पत्रकार जी की मुस्कुराहट थोड़ी फीकी पड़ी। शख्स रुका नहीं, उसने आगे कहा “ए/सी की हवा में बैठकर शब्दों की खेती करना आसान है साहब, पर कभी हमारे साथ उस खनिज विभाग के दफ्तर की तरफ चलिए। वहां के बंद कमरों में ऐसी-ऐसी फाइलें दफन हैं कि अगर आपकी कलम वहां की धूल झाड़ दे, तो उन कमरों के जंग लगे दरवाजे खुद-ब-खुद चीखने लगेंगे।”
पत्रकार साहब ने चश्मा उतारा, शायद उन्हें पहली बार दफ्तर की ठंडक में पसीना आ रहा था।

वह शख्स मुड़ा और जाते-जाते कह गया “अगली बार जब ‘कमाल के शब्द’ लिखेंगे साहब, तो बस एक नजर उस ग्राउंड ज़ीरो पर भी डाल लीजिएगा, जहाँ जनता खुद अपनी किस्मत का बुलडोजर लेकर निकल पड़े है। क्योंकि जब कलम के सिपाही सो जाते हैं, तभी जनता पहिए को हाथ में लेने पड़ते हैं।” दफ्तर का दरवाजा बंद हुआ, बाहर धूप तेज थी और अंदर पत्रकार साहब अब भी उस ‘बंद कमरे’ की चाबी अपने शब्दों में ढूंढ रहे थे।
















